कुरुक्षेत्र में भीष्म का धर्मराज को उपदेश
धर्मराज, सन्यास खोजना कायरता है मन की
है सच्चा मनुजत्व ग्रन्धियाँ सुलझाना जीवन की

दुर्लभ नहीं मनुज के हित, निज वैयक्तिक सुख पाना
किन्तु कठिन है कोटि-कोटि मनुजों को सुखी बनाना

जिस तप से तुम चाह रहे पाना केवल निज सुख को
कर सकता है दूर वही तप अमित नरों के दुखः को

स्यात, दुखः से तुम्हें कहीं निर्जन में मिले किनारा
शरण कहाँ पायेगा पर, यह दाह्यमान जग सारा ?

धर्मराज क्या यती भागता कभी गेह या वन से ?
सदा भागता फिरता है वह एकमात्र जीवन से

यह जीवन एक अरण्य झुरमुट, जो काटे अपनी राह बना ले
क्रीतदास यह नहीं किसी का, जो चाहे अपना ले

जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर, जो उस से डरते हैं
वह उनका जो चरण रोप, निर्भय हो कर लड़ते हैं

यह पयोधि सबका मुहँ करता विरत लवन-कटु जल से
देता सुधा उन्हें, जो मथते इसे मंदराचल से

धर्मराज, कर्मठ मनुष्य का पथ सन्यास नहीं है
नर जिस पर चलता वह मिट्टी है, आकाश नहीं है

                        --- रामधारी सिंह "दिनकर"
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